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सरकारी रिकॉर्ड या अहम सुबूत? घोड़ाडोंगरी तहसील परिसर में धू-धू कर जले दस्तावेज, निस्तारण प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल – Madhya Pradesh Voice

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सरकारी रिकॉर्ड या अहम सुबूत? घोड़ाडोंगरी तहसील परिसर में धू-धू कर जले दस्तावेज, निस्तारण प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल


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27/09/2026 6:12 PM Total Views: 482018

वायरल वीडियो में जमीन पर बिखरी दिखीं फाइलों की गड्डियां; क्या बिना पंचनामा बनाए नष्ट कर दिए गए किसानों और आदिवासियों के लंबित प्रकरणों के मूल रिकॉर्ड?

बैतूल/सारणी। घोड़ाडोंगरी तहसील कार्यालय परिसर से एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है। यहां बड़ी मात्रा में सरकारी कागजातों और दस्तावेजों को आग के हवाले करने का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है।

इस वीडियो ने तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली और सरकारी रिकॉर्ड के निस्तारीकरण की पूरी प्रक्रिया पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। वीडियो में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि एक तरफ दस्तावेजों का ढेर धू-धू कर जल रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर फाइलों और कागजातों की कई गड्डियां बिना किसी सुरक्षा के रखी हुई हैं। आशंका जताई जा रही है कि इनमें आम जनता के शिकायत आवेदन और लंबित प्रकरणों से जुड़े मूल रिकॉर्ड भी शामिल हो सकते हैं, जो इस पूरे मामले को जांच के दायरे में लाता है।

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गरीबों और किसानों के अहम दस्तावेजों के स्वाहा होने की आशंका

तहसील कार्यालय वह स्थान है जहां ग्रामीण क्षेत्रों के किसान, आदिवासी और मजदूर न्याय की उम्मीद में पहुंचते हैं। यहां जमीन के सीमांकन, नामांतरण, अवैध कब्जे की शिकायतें और राजस्व विवादों से संबंधित अति-महत्वपूर्ण आवेदन प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिन दस्तावेजों को आग की भेंट चढ़ाया गया, वे वास्तव में किस श्रेणी के थे? क्या उनमें किसी गरीब किसान की जमीन का कोई अहम सुबूत था? बिना किसी स्पष्टीकरण के इन कागजातों को जलाए जाने से उन आवेदकों के भविष्य पर संकट गहरा गया है जिनके मामले अभी तक नहीं सुलझे हैं।

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क्या हुआ ‘रिकॉर्ड रिटेंशन शेड्यूल’ का पालन?

सरकारी रिकॉर्ड को केवल पुराना होने के आधार पर मनमाने तरीके से नष्ट करना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि गैर-कानूनी भी है। भारत के सार्वजनिक अभिलेख कानूनों के तहत रिकॉर्ड नष्ट करने की एक सख्त प्रक्रिया (रिकॉर्ड रिटेंशन शेड्यूल) निर्धारित है। इसके तहत प्रत्येक रिकॉर्ड की उपयोगिता और संरक्षण अवधि तय होती है।

प्रशासन को अब यह स्पष्ट करना होगा कि, क्या जलाए गए रिकॉर्ड को निस्तारण योग्य (Destructible) के रूप में चिन्हित किया गया था? क्या दस्तावेजों को नष्ट करने से पहले उनकी कोई सूची तैयार की गई थी और सक्षम अधिकारी ने उनका परीक्षण किया था? क्या इस पूरी प्रक्रिया का कोई आधिकारिक पंचनामा तैयार किया गया है? लंबित प्रकरणों पर संकट और पर्यावरण की अनदेखी

सूत्रों का दावा है कि तहसील कार्यालय में वर्तमान में कई प्रकरण लंबित हैं। यदि इन जली हुई फाइलों में लंबित मामलों के मूल दस्तावेज शामिल थे, तो आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई पूरी तरह बाधित हो सकती है। आवेदकों के पास अब अपने मामलों को साबित करने के लिए दस्तावेज बचे भी हैं या नहीं, यह एक बड़ा जांच का विषय है।

इसके अलावा, वायरल वीडियो में कागजों के साथ-साथ प्लास्टिक जैसी सामग्री भी जलती हुई दिखाई दे रही है। सरकारी परिसर के भीतर खुले में इस तरह से आग लगाना पर्यावरणीय नियमों का सीधा उल्लंघन है, जिससे वायु प्रदूषण की स्थिति पैदा हुई है।

प्रशासनिक जवाबदेही की मांग

यह मामला केवल पुराने कागजों की सफाई का नहीं, बल्कि सरकारी पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा है। मध्यप्रदेश voice इस खबर के माध्यम से प्रशासन का ध्यान इस ओर आकृष्ट करता है कि इस पूरी घटना की एक उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। तहसील कार्यालय को सार्वजनिक रूप से यह रिकॉर्ड प्रस्तुत करना चाहिए कि जलाए गए दस्तावेज किस वर्ष के थे, उन्हें नष्ट करने का आदेश किसने दिया था और क्या वास्तव में उन फाइलों में ऐसे अहम सुबूत थे जिन्हें कार्यालय में सुरक्षित रखा जाना चाहिए था। जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, घोड़ाडोंगरी तहसील की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में ही रहेगी।

इनका कहना है –

  • कोई फाइल नहीं जलाई गई है, रिकॉर्ड रूम की साफ सफाई की गई थी। यूज्डपेपर है वह जलाए जा रहे है उसमें। कोई फाइलें नहीं जलाई जा रही है। फिर भी मैं एक बार चेक करवाऊंगी बाकी फाइलें नहीं जली है कोई।
संध्या रावत, तहसीलदार घोड़ाडोंगरी

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से क्या आप संतुष्ट हैं? अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।


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