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सारनी में एनजीटी के आदेशों की उड़ रही धज्जियां: प्रतिबंध के बावजूद खुलेआम जारी है रेत का अवैध खनन और परिवहन – Madhya Pradesh Voice

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सारनी में एनजीटी के आदेशों की उड़ रही धज्जियां: प्रतिबंध के बावजूद खुलेआम जारी है रेत का अवैध खनन और परिवहन


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02/08/2026 1:38 AM Total Views: 493010

30 जून से 30 सितंबर तक खनन-परिवहन पर प्रतिबंध के बाद भी नदियों से रेत निकालने और सप्लाई का सिलसिला जारी,खनिज व राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली कठघरे में

सारनी। पर्यावरण संरक्षण और नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) द्वारा बनाए गए नियम सारनी और इसके आसपास के क्षेत्रों में केवल कागजों तक सिमट कर रह गए हैं। वर्षा ऋतु के दौरान (30 जून से 30 सितंबर तक) नदी-नालों से रेत खनन और परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध होने के बावजूद, क्षेत्र में रेत माफियाओं का राज बेखौफ चल रहा है।

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इस अवैध कारोबार ने न केवल पर्यावरण और जैव विविधता के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली और उसकी मंशा पर भी कई बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

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प्रतिबंध के बीच कहाँ से आ रही है रेत?

एनजीटी का स्पष्ट निर्देश है कि मानसून के दौरान नदियों के प्राकृतिक प्रवाह से छेड़छाड़ न की जाए। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। स्थानीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शहर में चल रहे विभिन्न बड़े निर्माण कार्यों में रेत की आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी है।

जिन प्रमुख संस्थानों और क्षेत्रों में यह रेत खपने के आरोप लग रहे हैं, उनमें शामिल हैं, नगर पालिका परिषद (NPP), सारनी के अंतर्गत होने वाले निर्माण कार्य। वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) से जुड़े प्रोजेक्ट्स। मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी (MPPGCL) के कार्य। शहर में तेजी से पनप रहे निजी आवासीय और व्यावसायिक निर्माण में किया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पूरे प्रदेश में रेत खनन और परिवहन पर आधिकारिक रोक लगी हुई है, तो इन निर्माण कार्यों के लिए ट्रकों और ट्रैक्टरों में भरकर रेत कहाँ से पहुंच रही है?

रेत माफियाओं का गठजोड़ और मौन प्रशासन

क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि इस पूरे अवैध खेल के पीछे रेत ठेकेदारों और उनके संरक्षणकर्ताओं का एक मजबूत सिंडिकेट काम कर रहा है। हालांकि, इन दावों की अभी तक कोई आधिकारिक या स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सड़कों पर दौड़ते रेत से भरे वाहन खुद-ब-खुद पूरी कहानी बयां कर रहे हैं।

हैरानी की बात यह है कि रेत की अवैध ढुलाई कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है। इसके बावजूद, निगरानी करने वाले जिम्मेदार विभागों ने अपनी आंखें मूंद रखी हैं।

प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठते गंभीर सवाल

स्थानीय नागरिकों में इस प्रशासनिक उदासीनता को लेकर भारी आक्रोश है। जनता सीधे तौर पर निम्नलिखित विभागों से जवाब मांग रही है। क्या खनिज विभाग के अधिकारियों को इस बात की भनक नहीं है कि उनके अधिकार क्षेत्र में अवैध खनन हो रहा है? यदि जानकारी है, तो अब तक छापामार कार्रवाई क्यों नहीं की गई? स्थानीय स्तर पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी राजस्व विभाग की भी होती है। क्या यह मिलीभगत का नतीजा है या महज लापरवाही? यदि यह परिवहन किसी विशेष अनुमति या स्टॉक (भंडारण) के तहत वैध रूप से हो रहा है, तो संबंधित विभागों ने सार्वजनिक रूप से इसकी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की?

जिला प्रशासन से सख्त कार्रवाई की दरकार

अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और कलेक्टर पर टिक गई हैं। यह स्पष्ट है कि यदि अधिकारी पूरे घटनाक्रम से वाकिफ होने के बावजूद प्रभावी अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं, तो इससे समाज में यह गलत संदेश जा रहा है कि कानून और नियम केवल आम जनता के लिए हैं, रसूखदारों के लिए नहीं।

वक्त की मांग है कि इस मामले में एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच समिति का गठन किया जाए। यदि प्रतिबंध अवधि में अवैध खनन और परिवहन साबित होता है, तो न केवल ठेकेदारों पर, बल्कि उन अधिकारियों पर भी सख्त दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए जिनकी नाक के नीचे यह सब चल रहा है।

यदि जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह धारणा और पुख्ता हो जाएगी कि पर्यावरण को बचाने वाला तंत्र पूरी तरह से फेल हो चुका है और एनजीटी के आदेश महज एक औपचारिकता बनकर रह गए हैं।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से क्या आप संतुष्ट हैं? अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।


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