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खाकी की साख पर बट्टा: अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद भी खुलेआम घूम रहा अय्यूब मंसूरी, पुलिस की ‘मौन स्वीकृति’ पर जनता के तीखे सवाल – Madhya Pradesh Voice

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खाकी की साख पर बट्टा: अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद भी खुलेआम घूम रहा अय्यूब मंसूरी, पुलिस की ‘मौन स्वीकृति’ पर जनता के तीखे सवाल


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03/01/2026 11:23 AM Total Views: 421075

सारनी। सोशल मीडिया पर 1 करोड़ 11 लाख व्यूवर्स का दम भरने वाला तथाकथित ‘फेसबुक फ्रेंड्स’, वकालत और पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग का खेल खेलने वाले अय्यूब मंसूरी अब पुलिस के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। सारनी पुलिस की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर आरोप लग रहे हैं कि वे अपराधी को सलाखों के पीछे भेजने के बजाय ‘मित्रता धर्म’ निभा रहे हैं। अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने और गंभीर धाराओं में मामला दर्ज होने के बावजूद आरोपी का खुलेआम घूमना और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना, पुलिस की वर्दी और इकबाल दोनों को चुनौती दे रहा है।

पुलिस की आंखों पर पट्टी या रसूख का असर?

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मामला 25 दिसंबर का है, जब अय्यूब मंसूरी की प्रताड़ना का शिकार हुई सारिका मिस्त्री ने थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने दबाव में आकर एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) सहित विभिन्न धाराओं में मामला तो पंजीबद्ध कर लिया, लेकिन गिरफ्तारी के नाम पर हाथ खाली हैं। हैरत की बात यह है कि एफआईआर के बाद आरोपी चार दिनों तक फरार रहा और अग्रिम जमानत की जुगत भिड़ाता रहा, जिसे माननीय न्यायालय ने सिरे से खारिज कर दिया।

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​नियमतः जमानत खारिज होने के बाद पुलिस को तत्काल गिरफ्तारी करनी चाहिए थी। परंतु, 9 दिन बीत जाने के बाद भी सारनी पुलिस आरोपी के गिरेबान तक नहीं पहुंच पाई है। जबकि शहर के नागरिकों का दावा है कि अय्यूब मंसूरी बीते दो दिनों से क्षेत्र में चोरी-छिपे नहीं, बल्कि बेखौफ घूम रहा है और फेसबुक पर लगातार पोस्ट डालकर सिस्टम का मजाक उड़ा रहा है। जो आरोपी पूरे शहर को दिख रहा है, वह स्थानीय पुलिस को नजर क्यों नहीं आ रहा? यह ‘अंधापन’ पुलिस की लाचारी है या फिर आरोपी को दिया जा रहा खुला संरक्षण?

अधिकारियों के साथ फोटो का दिखावा और जनता में अविश्वास

शिकायतकर्ता सारिका मिस्त्री और रितेश जुल्मे का आरोप है कि अय्यूब मंसूरी अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर थाना प्रभारी और एसडीओपी (SDOP) मैडम के साथ फोटो डालकर जनता और पीड़ितों पर धौंस जमाता है। अब जब कार्रवाई की बारी आई है, तो पुलिस की सुस्त चाल देखकर लोग यह मानने को मजबूर हैं कि क्या पुलिस वास्तव में अय्यूब को अपना ‘जिगरी दोस्त’ मानकर उसे अभयदान दे रही है? सारिका मिस्त्री ने एसपी और एडिशनल एसपी से मिलकर आईटी एक्ट और ब्लैकमेलिंग की धाराएं बढ़ाने की मांग की थी, जिस पर आश्वासन तो मिला, लेकिन स्थानीय स्तर पर पुलिस की ‘कमजोर इच्छाशक्ति’ ने न्याय की उम्मीदों को धुंधला कर दिया है।

बीमा क्लेम में धोखेबाजी: मृतिका के पति को धमकाने में भी पुलिस खामोश

अय्यूब मंसूरी का काला चिट्ठा केवल यही तक सीमित नहीं है। 27 दिसंबर 2025 को रितेश जुल्मे ने एसडीओपी कार्यालय में न्याय की गुहार लगाई थी। रितेश ने बताया कि उनकी पत्नी स्व. इंदिरा काशदे की एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी (पॉलिसी नं. 2X646217906) के क्लेम में अय्यूब भारी हेराफेरी कर रहा है।

​अशिक्षित पति को गुमराह करते हुए अय्यूब ने कहा कि 12 लाख रुपये के क्लेम की जगह सिर्फ 4 लाख मिलेंगे, और उसमें से भी उसे 2 लाख रुपये कमीशन और 12 ब्लैंक चेक चाहिए। जब रितेश ने बैतूल जाकर असलियत पता की और इसका विरोध किया, तो अय्यूब ने अपना असली चेहरा दिखाया। उसने धमकी दी कि— “मेरी दुकान पर कई लड़कियां काम करती हैं, किसी से भी झूठी शिकायत करवाकर अंदर करवा दूंगा। पुलिस प्रशासन के साथ मेरा उठना-बैठना है और आईजी इरशाद वली मेरे रिश्तेदार हैं।”

सिस्टम लाचार, आरोपी फरार (कागजों में)

एसडीओपी कार्यालय में शिकायत दिए 7 दिन बीत चुके हैं, लेकिन बीमा धोखाधड़ी और धमकी के इस गंभीर मामले में अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। एक तरफ गरीब फरियादी न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं, तो दूसरी तरफ आरोपी पुलिस की नाक के नीचे सोशल मीडिया चला रहा है।

​जब इस मामले में एसडीओपी का पक्ष जानने के लिए उनके सरकारी नंबर पर संपर्क किया गया, तो मोबाइल बंद होने के कारण उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका। यह संपर्कहीनता और पुलिस की निष्क्रियता यह साबित करने के लिए काफी है कि सारनी में कानून का राज है या फिर ‘संपर्कों’ का। जनता अब सोशल मीडिया पर पुलिस की भूमिका को लेकर तीखी आलोचना कर रही है, जिससे खाकी की छवि धूमिल हो रही है।

प्रशासन से सवाल: क्या पुलिस किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रही है, या फिर अय्यूब मंसूरी का रसूख कानून के हाथ से वाकई लंबा है?

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