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आत्महत्या कोई समाधान नहीं, चुप्पी तोड़ें और खुलकर करें संवाद: डॉ. संदीप गोहे – Madhya Pradesh Voice

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आत्महत्या कोई समाधान नहीं, चुप्पी तोड़ें और खुलकर करें संवाद: डॉ. संदीप गोहे


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10/09/2026 9:37 AM Total Views: 471899

भोपाल। आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की उस समय की गहरी मानसिक पीड़ा का संकेत है जब उसे लगता है कि उसके पास कोई रास्ता नहीं बचा है। ऐसे कठिन समय में सबसे जरूरी है उस व्यक्ति के साथ खड़े होना, उसकी बात सुनना और उससे बातचीत शुरू करना। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर मनोवैज्ञानिक, लेखक एवं मेंस मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. संदीप गोहे ने समाज से आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर चुप्पी तोड़ने और खुलकर संवाद करने की अपील की है।

पहचानें मानसिक संकट के शुरुआती संकेत

डॉ. गोहे के अनुसार किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव, लगातार निराशा, अकेले रहना, लोगों से दूरी बनाना, भविष्य को लेकर नकारात्मक बातें करना या जीवन को लेकर हताश नजर आना ऐसे गंभीर संकेत हैं जिन्हें कभी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को कमजोर कहने या उसकी भावनाओं का मजाक उड़ाने के बजाय बिना किसी पूर्वाग्रह के उसकी बात सुनना और जरूरत पड़ने पर तुरंत मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता दिलाना बेहद जरूरी है।

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पुरुषों में आत्महत्या का अनुपात चिंताजनक, महिलाओं से तीन गुना अधिक

आत्महत्या से जुड़े आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला अंतर देखने को मिलता है। भारत जैसे देश में महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों द्वारा आत्महत्या से होने वाली मौतों का अनुपात तीन गुना अधिक है, हालांकि महिलाएं आत्महत्या का प्रयास अपेक्षाकृत अधिक करती हैं। इसके पीछे कई सामाजिक और व्यवहारिक कारण जिम्मेदार हैं। पुरुष अक्सर फांसी या अन्य अधिक घातक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें बचने की संभावना न के बराबर होती है। इसके अलावा, परिवार के मुखिया, मुख्य कमाने वाले और हमेशा मजबूत बने रहने का भारी सामाजिक दबाव भी पुरुषों की मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। आर्थिक संकट, बेरोजगारी, नौकरी जाने का डर, कारोबार या खेती में नुकसान और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ उन्हें अंदर से तोड़ देता है।

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मदद मांगना कमजोरी नहीं, साहस है

समाज में लंबे समय से चली आ रही यह धारणा कि पुरुषों को अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करनी चाहिए, उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई है। तनाव और अवसाद से जूझते हुए भी कई पुरुष परिवार, दोस्तों या चिकित्सकों से मदद मांगने से कतराते हैं। मानसिक परेशानी को छिपाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसे और गंभीर बनाता है। डॉ. गोहे का कहना है कि पुरुषों को यह समझाना अनिवार्य है कि मदद मांगना कोई कमजोरी नहीं बल्कि साहस का प्रतीक है। परिवार और मित्रों को भी केवल यह पूछने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि ‘सब ठीक है?’, बल्कि जरूरत पड़ने पर धैर्यपूर्वक उनकी पूरी बात सुननी चाहिए।

बच्चों और युवाओं पर बढ़ता मानसिक दबाव

पढ़ाई का भारी दबाव, परीक्षाओं का तनाव, करियर की अनिश्चितता, पारिवारिक कलह, रिश्तों में असफलता और सोशल मीडिया पर होने वाली अवास्तविक तुलना आज के बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। माता-पिता और शिक्षकों को ऐसा सहज वातावरण तैयार करना चाहिए जहां बच्चे बिना किसी डर या झिझक के अपनी मानसिक परेशानियां खुलकर साझा कर सकें।

‘Changing the Narrative on Suicide’ है अभियान का विषय

प्रत्येक वर्ष 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2024 से 2026 तक के इस वैश्विक अभियान का मुख्य विषय “Changing the Narrative on Suicide” (आत्महत्या पर धारणा बदलना) और संदेश “Start the Conversation” (संवाद शुरू करें) रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य आत्महत्या से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों, कलंक और चुप्पी को खत्म कर संवेदनशील बातचीत को बढ़ावा देना है।

मानसिक स्वास्थ्य केवल एक दिन का मुद्दा नहीं

डॉ. गोहे का स्पष्ट संदेश है कि मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत केवल एक दिन का अभियान नहीं होना चाहिए। परिवार, समाज और विभिन्न संस्थानों को मिलकर ऐसा परिवेश तैयार करना होगा जहाँ मानसिक परेशानी को छिपाने के बजाय उस पर खुलकर बात करना सामान्य माना जाए। समय पर की गई बातचीत, संवेदनशीलता और विशेषज्ञ की सही सलाह किसी की अनमोल जिंदगी बचाने में निर्णायक साबित हो सकती है।

सहायता के लिए संपर्क करें:

यदि आप या आपका कोई परिचित मानसिक तनाव या संकट से गुजर रहा है, तो तुरंत टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 अथवा 1800-89-14416 पर संपर्क

कर सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से क्या आप संतुष्ट हैं? अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।


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