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शिक्षा या व्यापार? ‘पढ़ेगा इंडिया’ के सपने को खोखला कर रही निजी स्कूलों की मनमानी – Madhya Pradesh Voice

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शिक्षा या व्यापार? ‘पढ़ेगा इंडिया’ के सपने को खोखला कर रही निजी स्कूलों की मनमानी


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06/04/2026 8:42 PM Total Views: 499362

सारणी। “पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया” यह महज़ एक नारा नहीं, बल्कि देश के भविष्य की एक मजबूत नींव है। लेकिन ज़मीनी हकीकत में अब यह सपना अधूरा और खोखला होता नज़र आ रहा है। वजह साफ है, शिक्षा अब एक पवित्र दायित्व नहीं, बल्कि मुनाफे का एक विशुद्ध ‘व्यवसाय’ बन चुकी है। सारणी के सेंट फ्रांसिस स्कूल की बढ़ती मनमानी और तानाशाही इसका जीता-जागता प्रमाण है, जो आज आम अभिभावकों की कमर तोड़ रही है।

नियमों की उड़ती धज्जियां और मनमानी फीस वृद्धि

शिक्षा विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी निजी स्कूल अपनी ट्यूशन फीस में शिक्षा विभाग से बिना प्रस्तावित किया सालाना 10% से अधिक की वृद्धि नहीं कर सकता। लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। सेंट फ्रांसिस स्कूल जैसे संस्थान इन नियमों को ताक पर रखकर हर साल मनमाने तरीके से फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी कर रहे हैं। अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य की खातिर इस अन्याय को चुपचाप सहने को मजबूर हैं, और स्कूल प्रबंधन इस मजबूरी का पूरा फायदा उठा रहा है।

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‘कमीशन का गोरखधंधा’: हर साल बदलते सिलेबस और यूनिफॉर्म

लूट का यह सिलसिला सिर्फ भारी-भरकम ट्यूशन फीस तक ही सीमित नहीं है। इन निजी शिक्षण संस्थानों ने कमाई का एक नया नेक्सस (Nexus) तैयार कर लिया है। किताबों का मायाजाल ऐसा बुना जाता है कि हर साल ‘सिलेबस में बदलाव’ के नाम पर अनावश्यक रूप से महंगी किताबें थोपी जाती हैं। यूनिफॉर्म का व्यापार बिना किसी ठोस कारण के यूनिफॉर्म के रंग या डिज़ाइन में बदलाव कर दिया जाता है ताकि अभिभावक नई ड्रेस खरीदने पर मजबूर हों। चुनिंदा दुकानों का एकाधिकार का सौदा कर स्कूल प्रबंधन शहर के कुछ चुनिंदा पुस्तक और यूनिफॉर्म विक्रेताओं के साथ बंद कमरों में ‘कमीशन’ की सौदेबाजी करते हैं। जो विक्रेता सबसे मोटा कमीशन देता है, स्कूल द्वारा अभिभावकों को उसी की दुकान से सामग्री खरीदने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बाध्य किया जाता है।

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जबलपुर कलेक्टर की सख्त कार्रवाई से लेनी होगी सीख

इस बेलगाम तानाशाही पर कैसे लगाम कसी जा सकती है, इसका सटीक उदाहरण पिछले साल जबलपुर के कलेक्टर रहे दीपक सक्सेना ने पेश किया था। उन्होंने कॉपी-किताबों और ड्रेस के नाम पर हो रही इस खुली लूट के खिलाफ एक ऐतिहासिक और सख्त कदम उठाया था।

उनके कड़े निर्देश थे कि NCERT को प्राथमिकता दी जाए स्कूलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे सिर्फ NCERT की किताबों पर ही ज़ोर दें। कीमतों पर नियंत्रण किया गया कि यदि किसी विषय के लिए प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें लगाना बेहद ज़रूरी हो, तो उनकी कीमत NCERT की किताबों के रेट से 25% से ज़्यादा किसी भी हाल में नहीं होनी चाहिए। दुकानों की मोनोपॉली खत्म करने के लिए प्रशासन ने स्कूलों और प्राइवेट दुकानों के इस गठजोड़ पर कड़ी नज़र रखी और यह सुनिश्चित किया कि कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से ही सामान खरीदने के लिए मजबूर न कर सके।

प्रशासन से सीधा सवाल: आखिर कब थमेगी यह लूट?

आज सारणी सहित पूरे प्रदेश को जबलपुर जैसी ही सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की दरकार है। शिक्षा के नाम पर जो दुकानें सजाई गई हैं, वे आम आदमी के बच्चों से शिक्षा का अधिकार छीन रही हैं।

शिक्षा के नाम पर अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डालने वाली सेंट फ्रांसिस स्कूल के लिए अब समय आ गया है कि शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन मूकदर्शक की भूमिका से बाहर आएं। इन शिक्षा के ‘व्यापारियों’ पर नकेल कसना अब सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनिवार्यता बन गई है, ताकि ‘पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया’ का सपना महज़ कागज़ों या विज्ञापनों तक ही सिमट कर न रह जाए।

इनका कहना है :—

  • मैं अभी मीटिंग पर हूं मैं थोड़ी देर से कॉल बैक करता हूं।

भूपेंद्र बरकड़े, जिला शिक्षा अधिकारी

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