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सारनी नपा का ‘नंबर वन’ बनने का दावा, 43 हजार पौधे धरातल पर लगे या सिर्फ कागजों में दौड़ाये गए घोड़े? – Madhya Pradesh Voice

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सारनी नपा का ‘नंबर वन’ बनने का दावा, 43 हजार पौधे धरातल पर लगे या सिर्फ कागजों में दौड़ाये गए घोड़े?


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29/01/2026 10:51 AM Total Views: 420839

सारनी | नगर पालिका परिषद सारनी ने ‘अमृत हरित महाभियान’ के तहत प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त करने का दावा तो कर दिया है, लेकिन यह उपलब्धि अब सवालों के घेरे में है। नपा प्रशासन ने वाहवाही लूटने और टीआरपी बटोरने की होड़ में आंकड़ों की ऐसी बाजीगरी दिखाई है कि आम जनता और पर्यावरण प्रेमी अब पूछ रहे हैं— “आखिर 43 हजार पौधे लगे कहां हैं?” कहीं गिनती में वह तो नहीं जहां पौधों के चलते रंग रोगन करने में नगर पालिका परिषद को दिक्कतें आ रही है।

रातों-रात लक्ष्य पूरा या आंकड़ों का खेल?

मुख्य नपा अधिकारी सीके मेश्राम और उनकी टीम ने दावा किया है कि उन्होंने समय सीमा से पहले ही लक्ष्य हासिल कर लिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में (43,000 से ज्यादा) पौधे इतने कम समय में कैसे और कहां रोप दिए गए? क्या डब्ल्यूसीएल (WCL) और एमपीपीजीसीएल (MPPGCL) के क्षेत्रों में समन्वय के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई है? जानकारों का कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड में चढ़ाए गए आंकड़े और धरातल की सच्चाई में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है।

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अवॉर्ड मिला, पर क्या पौधे जीवित बचेंगे?

प्रशासनिक अकादमी भोपाल में पुरस्कार तो ले लिया गया, लेकिन क्या किसी सक्षम अधिकारी ने मौके पर जाकर यह भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया कि जो पौधे रोपे गए हैं, उनमें से कितने जीवित हैं? अक्सर देखा गया है कि पौधारोपण अभियानों में फोटो खिंचवाने और फाइलें भरने तक ही सीमित रह जाते हैं। क्या यह अभियान भी उसी “कागजी हरियाली” का हिस्सा है?

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द्वितीय चरण की तैयारी या नए बजट की जुगाड़?

उपयंत्री नितिन मीणा का कहना है कि द्वितीय चरण की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं और इसे भी ‘योजनाबद्ध’ तरीके से किया जाएगा। लेकिन जब पहले चरण की पारदर्शिता (Transparency) ही संदिग्ध है, तो दूसरे चरण की हड़बड़ी क्यों? आलोचकों का मानना है कि यह सब केवल सरकारी बजट को खपाने और फाइलों में ‘ऑल इज वेल’ दिखाने की कवायद हो सकती है।

जनता पूछ रही कहां लगे पौधे?

अगर सच में 43 हजार पौधे लगे हैं, तो शहर हरा-भरा क्यों नहीं दिख रहा? नपा को चाहिए कि वह उन स्थानों की सूची सार्वजनिक करे जहाँ ये पौधे रोपे गए हैं, ताकि जनता खुद जाकर देख सके कि प्रशासन ने ‘अमृत’ घोला है या सिर्फ जनता की आंखों में ‘धूल’।

संपादकीय नोट: यह खबर प्रशासन के दावों की जमीनी हकीकत की जांच करने की मांग करती है। क्या यह पुरस्कार वास्तविक कार्य के लिए है या केवल बेहतर डॉक्यूमेंटेशन और प्रेजेंटेशन के लिए?

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से क्या आप संतुष्ट हैं? अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।


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