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मध्यप्रदेश ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर: सतपुड़ा ताप विद्युत गृह सारनी में 660 MW सुपरक्रिटिकल परियोजना का सिविल कार्य शुरू, पहला ‘पीसीसी पोर’ संपन्न – Madhya Pradesh Voice

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मध्यप्रदेश ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर: सतपुड़ा ताप विद्युत गृह सारनी में 660 MW सुपरक्रिटिकल परियोजना का सिविल कार्य शुरू, पहला ‘पीसीसी पोर’ संपन्न


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11/06/2026 10:14 PM Total Views: 446173

प्रवीर कुमार, 7489579303

सारनी। मध्य प्रदेश को ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर और बिजली सरप्लस राज्य बनाने की दिशा में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी लिमिटेड (MPPGCL) के अंतर्गत सतपुड़ा ताप विद्युत गृह, सारनी में निर्माणाधीन 660 मेगावाट (MW) क्षमता की अत्याधुनिक सुपरक्रिटिकल ताप विद्युत परियोजना ने 10 जून को एक बेहद महत्वपूर्ण मील का पत्थर (Milestone) पार कर लिया है।

परियोजना के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्से—मुख्य बॉयलर क्षेत्र (Main Boiler Area)—में पहले पीसीसी (प्लेन सीमेंट कंक्रीट) पोर की औपचारिक शुरुआत सफलतापूर्वक कर दी गई है। इस प्रक्रिया के साथ ही अब परियोजना के मुख्य ढांचे की नींव (Foundation) निर्माण का कार्य अत्यंत तेज गति से आगे बढ़ेगा।

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शीर्ष प्रबंधन की सीधी निगरानी में हुआ कार्य

इस ऐतिहासिक निर्माण चरण की शुरुआत मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी के प्रबंध संचालक (MD) मनजीत सिंह की सीधी निगरानी और कुशल मार्गदर्शन में की गई। इस महत्वपूर्ण अवसर पर जमीनी स्तर पर तालमेल बिठाने के लिए सतपुड़ा ताप विद्युत गृह के मुख्य अभियंता (Chief Engineer) सुशील लिल्लोरे सहित कंपनी के तमाम वरिष्ठ अभियंता, तकनीकी विशेषज्ञ और निर्माण कार्य से जुड़े कार्मिक उपस्थित रहे। प्रबंधन की इस सक्रियता ने ग्राउंड स्टाफ का हौसला दोगुना कर दिया है।

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क्या है ‘पीसीसी पोर’ और क्यों है यह महत्वपूर्ण?

एक थर्मल पावर प्लांट का बॉयलर बेहद विशालकाय, गगनचुंबी और भारी-भरकम संरचना होती है। इस विशाल ढांचे को दशकों तक स्थिरता प्रदान करने के लिए एक बेहद मजबूत नींव की आवश्यकता होती है। मुख्य बॉयलर क्षेत्र में शुरू किया गया यह पहला पीसीसी पोर दरअसल उसी मजबूत नींव की सबसे निचली और आधारभूत परत है। इस पीसीसी परत के पूर्ण रूप से सेट (ठोस) होने के तुरंत बाद, इसके ऊपर आरसीसी (रिनफर्स्ड सीमेंट कंक्रीट) की मुख्य संरचना तैयार की जाएगी। इसके बाद भारी-भरकम स्टील कॉलम स्थापित किए जाएंगे, जो पूरे बॉयलर ढांचे का हजारों टन भार संभालेंगे।

मुख्य अभियंता सुशील लिल्लोरे ने बताया कि कंपनी प्रबंधन द्वारा लगातार की जा रही समीक्षा और ‘टाइम-बाउंड मॉनिटरिंग’ (समयबद्ध निगरानी) का ही परिणाम है कि यह बेहद जटिल सिविल निर्माण चरण निर्धारित समय-सीमा के भीतर शुरू किया जा सका।

सुरक्षा और निर्माण की गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं

परियोजना में स्थायित्व और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाई जा रही है। पीसीसी पोरिंग कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों और अंतरराष्ट्रीय स्तर की निर्माण गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कंक्रीट की मिक्सिंग, ग्रेडिंग और पोरिंग की पूरी प्रक्रिया आधुनिक स्वचालित निगरानी प्रणालियों (Automated Monitoring Systems) के जरिए नियंत्रित की जा रही है। ऑन-साइट अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं के माध्यम से कंक्रीट के हर बैच की सघन जांच की जा रही है, ताकि भविष्य में बनने वाली नींव पूरी तरह अचूक, मजबूत और दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ साबित हो।

पुरानी इकाइयों की जगह लेगी ‘सुपरक्रिटिकल’ तकनीक

यह परियोजना पर्यावरण और ऊर्जा दक्षता के मामले में मध्य प्रदेश के लिए एक गेम-चेंजर साबित होने वाली है। यह 660 मेगावाट की नई यूनिट, सारनी की उन पुरानी और बंद हो चुकी पारंपरिक इकाइयों के स्थान पर स्थापित की जा रही है जो अपनी मियाद पूरी कर चुकी थीं। सुपरक्रिटिकल तकनीक पर आधारित होने के कारण यह इकाई बेहद उच्च तापमान और दबाव पर काम करेगी। इससे कोयले की खपत कम होगी और कम लागत में अधिक बिजली पैदा की जा सकेगी। आधुनिक उत्सर्जन नियंत्रण प्रणालियों से लैस होने के कारण यह परियोजना पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाएगी और कार्बन फुटप्रिंट को नियंत्रित रखेगी।

भविष्य की राह: मैकेनिकल इरेक्शन की ओर कदम

मुख्य बॉयलर क्षेत्र में पहले पीसीसी पोर की शुरुआत इस बात का स्पष्ट संकेत है कि परियोजना अब कागजी और शुरुआती दौर से निकलकर धरातल पर तीव्र गति से आगे बढ़ रही है।

सिविल इंजीनियरिंग का यह बुनियादी कार्य पूर्ण होते ही यह मेगा प्रोजेक्ट अपने अगले चरण यानी मैकेनिक इरेक्शन (Mechanical Erection) में प्रवेश कर जाएगा, जहां भारी मशीनरियों और बॉयलर के कलपुर्जों को असेंबल करने का काम शुरू होगा। इस रफ्तार को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना अपने निर्धारित समय पर या उससे पहले ही पूरी होकर प्रदेश की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए ग्रिड से जुड़ जाएगी।

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