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‘हाई सोसाइटी’ की चकाचौंध में शिक्षा का खुला व्यापार! नियमों की धज्जियां उड़ाकर अभिभावकों की जेब काट रहा सेंट फ्रांसिस स्कूल – Madhya Pradesh Voice

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‘हाई सोसाइटी’ की चकाचौंध में शिक्षा का खुला व्यापार! नियमों की धज्जियां उड़ाकर अभिभावकों की जेब काट रहा सेंट फ्रांसिस स्कूल


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10/04/2026 1:31 AM Total Views: 415957

बैतूल/सारनी। हर माता-पिता का यह स्वाभाविक सपना होता है कि उनके बच्चे बेहतरीन माहौल में शिक्षा ग्रहण करें। इसी चाहत में वे अपने बच्चों का दाखिला उन निजी स्कूलों में करवाते हैं, जो ‘हाई सोसाइटी’ के रुतबे और चकाचौंध का दिखावा करते हैं। माता-पिता सोचते हैं कि इस चमक-दमक के बीच उनके बच्चे न सिर्फ अच्छी पढ़ाई करेंगे, बल्कि एक उच्च स्तरीय रहन-सहन सीखकर उनका नाम रोशन करेंगे। लेकिन, इस मोहपाश में अभिभावक यह बुनियादी बात भूल जाते हैं कि ‘हर चमकती चीज सोना नहीं होती।’ खासतौर पर तब, जब शिक्षा के पवित्र मंदिरों को पूरी तरह से व्यापारिक प्रतिष्ठानों में तब्दील कर दिया गया हो।

सारनी का सेंट फ्रांसिस स्कूल आज इसी दिखावे और शिक्षा के बाजारीकरण का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग के सख्त नियमों को ताक पर रखकर, यह स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को आर्थिक बोझ तले बेरहमी से दबा रहा है।

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मध्य प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग ने अभिभावकों को आर्थिक शोषण से बचाने के लिए कई स्पष्ट नियम बनाए हैं, लेकिन सेंट फ्रांसिस स्कूल इन नियमों को धता बताते हुए अपनी मनमानी चला रहा है।

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यूनिफॉर्म के नाम पर ‘ड्रेस कोड’ का खेल

मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग का स्पष्ट निर्देश है कि प्राइवेट स्कूल अपनी यूनिफॉर्म बार-बार नहीं बदल सकते। यदि कोई बदलाव किया जाता है, तो उसकी पूर्व सूचना विभाग और अभिभावकों को देनी होती है। एक बार लागू की गई यूनिफॉर्म कम से कम तीन अकादमिक सत्रों तक बदलनी नहीं चाहिए। लेकिन स्कूल द्वारा इन नियमों को दरकिनार कर दिया गया है। यूनिफॉर्म में अनावश्यक बदलाव कर अभिभावकों पर हर साल नया आर्थिक बोझ लादा जा रहा है।

सरकार का साफ निर्देश है कि कक्षा 1 से 12 तक NCERT के पाठ्यक्रम को ही प्राथमिकता दी जाए। पुरानी किताबें बदलने पर इसलिए रोक है ताकि छोटे भाई-बहनों या अन्य बच्चों के काम आ सकें। सिलेबस बदलने की स्थिति में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को सूचना देना अनिवार्य है।

कुछ अभिभावक को का कहना है की सेंट फ्रांसिस स्कूल द्वारा सस्ती और गुणवत्तापूर्ण NCERT किताबों की जगह, हर साल निजी पब्लिशर्स की महंगी किताबें सिलेबस में थोप दी जाती हैं। किताबों की सूची में हर साल ऐसा फेरबदल किया जाता है कि पुरानी किताबें रद्दी बन जाती हैं और अभिभावकों को मजबूरन नई और महंगी किताबें खरीदनी पड़ती हैं।

जबकि नियम कहता है स्कूलों को हर साल अपने फीस स्ट्रक्चर का ब्योरा और फीस वृद्धि की जानकारी शिक्षा विभाग को सौंपनी होती है। लेकिन सेंट फ्रांसिस स्कूल प्रबंधन बिना किसी पारदर्शिता के फीस में मनमानी बढ़ोतरी कर रहा है, जिसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है।

दिखावे के जाल में पिसता मध्यम वर्ग

सेंट फ्रांसिस स्कूल की इस अंधाधुंध कमाई और ‘हाई सोसाइटी’ के भ्रमजाल में सबसे ज्यादा नुकसान मध्यमवर्गीय परिवारों का हो रहा है। महंगाई के इस दौर में माता-पिता अपनी सुख-सुविधाओं में कटौती करके बच्चों की फीस, महंगी किताबें और नई यूनिफॉर्म का खर्च उठा रहे हैं। बच्चों के भविष्य और स्कूल द्वारा निकाले जाने के डर से अभिभावक खुलकर विरोध भी नहीं कर पाते।

क्या सो रहा है शिक्षा विभाग?

नियमों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में अगर प्राइवेट स्कूल शिक्षा विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो उन पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। नियमों की अवहेलना पर शिक्षा विभाग स्कूल प्रबंधन को नोटिस जारी कर सकता है और भारी जुर्माना लगा सकता है। अगर स्कूल बार-बार नियमों का उल्लंघन करता है और अभिभावकों का शोषण जारी रहता है, तो उसकी मान्यता भी रद्द की जा सकती है।

अब सारनी की जनता और पीड़ित अभिभावक यह सवाल पूछ रहे हैं कि सब कुछ जानते हुए भी शिक्षा विभाग मौन क्यों है? यदि समय रहते सेंट फ्रांसिस स्कूल की इन व्यावसायिक गतिविधियों और मनमानी पर लगाम नहीं कसी गई, तो ‘शिक्षा का अधिकार’ केवल कागजों तक सिमट कर रह जाएगा।

इन्होंने कहा –

  • आपके माध्यम से मुझे जानकारी प्राप्त हुई है कि सेंट फ्रांसिस स्कूल में सिलेबस किताब और स्कूल ड्रेस को लेकर बदलाव किया गया है, मैं इसकी जांच कमेटी बनाकर जांच करवाता हु।

भूपेंद्र वरकड़े, जिला शिक्षा अधिकारी बैतूल

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