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ठोस सबूतों के बावजूद ‘अंधा’ बना सिस्टम, भाजपा राज में न्याय मांग रहे मजदूरों को मिल रही काम से निकालने की धमकियां – Madhya Pradesh Voice

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ठोस सबूतों के बावजूद ‘अंधा’ बना सिस्टम, भाजपा राज में न्याय मांग रहे मजदूरों को मिल रही काम से निकालने की धमकियां


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20/03/2026 11:08 AM Total Views: 492314

सारनी। मध्य प्रदेश के सारनी स्थित पाथाखेड़ा कोयला खदान क्षेत्र में मजदूरों का आक्रोश अब एक बड़ी ज्वाला का रूप ले रहा है। 18 दिनों की लंबी अनिश्चितकालीन हड़ताल और प्रशासन के खोखले आश्वासनों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सत्ता के संरक्षण में ठेकेदारों का राज चल रहा है। राज्य में काबिज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के शासनकाल में, जहां एक ओर ‘सबका साथ, सबका विकास’ के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि खदानों की गहराई में अपनी जान जोखिम में डालने वाले मजदूर भीषण शोषण और चरम अत्याचार का शिकार हो रहे हैं।

ठेकेदारों की खुलेआम लूट और नेताओं का सत्ता संरक्षण

मजदूरों की गाढ़ी कमाई पर ठेकेदारों द्वारा सरेआम डाका डाला जा रहा है, और स्थानीय लोगों का मानना है कि यह सब सत्ताधारी दल से जुड़े बड़े नेताओं के कथित संरक्षण के बिना बिल्कुल संभव नहीं है। मजदूरों के बैंक खातों में आने वाले 32,500 से 34,000 रुपये के वेतन में से 19,000 से 20,000 रुपये तक ठेकेदारों द्वारा डरा-धमका कर वापस वसूल लिए जाते हैं। महिला मजदूरों को भी नहीं बख्शा जा रहा है। उन पर 14,000 रुपये के वेतन में से 10,000 रुपये तक ठेकेदारों को लौटाने का दबाव बनाया जाता है। इनकार करने पर उन्हें काम से निकालने, दूरस्थ स्थानों पर भेजने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने जैसी घिनौनी हरकतें की जा रही हैं। मजदूरों का दावा है कि उनके पास ठेकेदारों की इस खुली वसूली और घर जाकर दी गई धमकियों के ऑडियो-वीडियो सबूत मौजूद हैं। इसके बावजूद, भाजपा सरकार का प्रशासनिक अमला इन ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने या उन पर एफआईआर दर्ज करने में पूरी तरह विफल रहा है।

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भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े समझौते: ‘सिस्टम’ की खुली पोल

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मजदूरों ने न्याय की गुहार लगाते हुए बैतूल कलेक्टर तक रैली निकाली थी, जहां 7 दिन में समाधान का आश्वासन दिया गया। लेकिन यह कार्रवाई ‘चींटी की चाल’ से भी धीमी साबित हुई।16 तारीख को भोपाल के श्रम अधिकारी आशीष गुप्ता के हस्तक्षेप के बाद इस शर्त पर आंदोलन स्थगित हुआ था कि तीन दिन के भीतर पूरा वेतन खातों में आ जाएगा। इस समझौते पर ठेकेदारों, प्रबंधन और श्रम अधिकारी के हस्ताक्षर भी हैं। समय सीमा बीतने के बाद भी भुगतान न होना इस बात का प्रमाण है कि ठेकेदार कानून और प्रशासन से ऊपर हो चुके हैं। क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि समझौते के अगले ही दिन ठेकेदारों द्वारा कथित तौर पर अधिकारी को ‘झोला भरकर पैसे’ दिए गए, कार्यवाही में टाल-मटोली हो जाएगी। इस चर्चाओं ने तूल पकड़ लिया है। तीन दिन बाद भी वेतन न मिलने से अब ये आरोप और भी पुख्ता होते नजर आ रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारियों की यह निष्क्रियता और भ्रष्टाचार सीधे तौर पर वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं। यह दर्शाता है कि शासन की नीतियां और अधिकारी, मजदूरों के बजाय पूंजीपतियों और भ्रष्ट ठेकेदारों के हित साधने में लगे हैं।

फिर भड़क सकती है क्रांति की आग

यह मामला अब केवल कुछ रुपयों का नहीं, बल्कि मजदूरों के आत्मसम्मान, उनके अधिकारों के हनन और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके विश्वास के टूटने का बन चुका है। सत्ता के अहंकार में डूबी सरकार और प्रशासन की इस बेरुखी ने पाथाखेड़ा का माहौल बारूद के ढेर जैसा कर दिया है।

समाजसेवी और मजदूर नेता प्रदीप नागले, मनोज पवार और संतोष देशमुख सहित अन्य नेताओं ने खुली चेतावनी दी है कि यदि ठेकेदारों की मनमानी पर तुरंत लगाम नहीं कसी गई और पूरा वेतन नहीं मिला, तो एक व्यापक आमरण अनशन और उग्र आंदोलन शुरू किया जाएगा। भाजपा सरकार को यह समझना होगा कि यदि जल्द ही इन शोषित मजदूरों को न्याय नहीं मिला, तो यह श्रमिक असंतोष एक बड़े जन-आक्रोश में तब्दील होकर सरकार की जड़ें हिला सकता है।

इनका कहना है:—

  • समय सीमा पूर्ण होने के बावजूद ठेकेदारों द्वारा मजदूरों को पेमेंट नहीं दी गई इस कार्रवाई को आगे के उच्च अधिकारियों के संज्ञान में दे दिया है। जितना मेरे हद में था वह मैंने किया है। फिर भी मैं नागले जी से बात करता हूं कि किन-किन ठेकेदारों ने पेमेंट नहीं दिया है फिर उन्हें पत्र लिखकर कहता हूं की पेमेंट करवाए।

आशीष गुप्ता, श्रम अधिकारी भोपाल (म0प्र0)

 

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