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विकास को तरसते घोड़ाडोंगरी में ‘दबंग’ सीएमओ की एंट्री: 6 साल का सूखा खत्म होने की उम्मीद, क्या अब बदलेगी तस्वीर? – Madhya Pradesh Voice

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विकास को तरसते घोड़ाडोंगरी में ‘दबंग’ सीएमओ की एंट्री: 6 साल का सूखा खत्म होने की उम्मीद, क्या अब बदलेगी तस्वीर?


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16/05/2026 10:52 AM Total Views: 407655

सारणी/घोड़ाडोंगरी। ग्राम पंचायत से नगर परिषद का दर्जा हासिल किए घोड़ाडोंगरी को लगभग 6 वर्ष बीत चुके हैं। यहां हुए नगरीय निकाय चुनावों को भी 4 साल पूरे होने वाले हैं, लेकिन आम जनता की आंखों में जो विकास के सपने थे, वे आज भी अधूरे हैं। नगर परिषद बनने के बाद उम्मीद थी कि सुविधाओं का विस्तार होगा, लेकिन हकीकत में परेशानियां कम होने के बजाय और बढ़ गई हैं। इन 6 सालों के दौरान कई सीएमओ (मुख्य नगर पालिका अधिकारी) आए और अपना कार्यकाल पूरा कर चले गए, लेकिन नगर की बदहाली जस की तस है।

अब घोड़ाडोंगरी नगर परिषद की कमान अपनी ‘दबंग’ और सख्त कार्यशैली के लिए पूरे प्रदेश में मशहूर ज्योति सुनहरे ने संभाली है। उनकी नियुक्ति के साथ ही नगर में चर्चाओं का बाजार गर्म है और जनता एक बार फिर अपने नगर के कायाकल्प की आस लगाए बैठी है।

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मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही जनता

नगर परिषद का दर्जा मिलने के बावजूद घोड़ाडोंगरी की स्थिति किसी पिछड़े ग्राम से कम नहीं है। आज भी जनता बस स्टैंड पर सर्वसुविधायुक्त प्रतीक्षालय और शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रही है। साप्ताहिक बाजारों में सुलभ शौचालय तक नहीं हैं। पेयजल की समस्या इस कदर हावी है कि आधी आबादी आज भी अपनी प्यास बुझाने के लिए हैंडपंपों के भरोसे है। प्रतिदिन पेयजल सप्लाई का वादा सिर्फ कागजों तक सीमित है। बारिश के पानी की निकासी का कोई माकूल इंतजाम नहीं है और नगर के प्रमुख नालों पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा है।

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आबादी भूमि 667: ‘शुभ-लाभ’ के खेल में पिसते आम लोग

विकास के अभाव के साथ-साथ घोड़ाडोंगरी में शासकीय आबादी भूमि (खसरा नंबर 667) का मामला भी ‘शुभ-लाभ’ के चक्कर में पूरी तरह विवादित कर दिया गया है। हालात यह हैं कि जो परिवार पीढ़ियों से इस भूमि पर निवास कर रहे हैं, वे अपने बुनियादी अधिकारों और फौती (मृत्यु उपरांत) नामांतरण जैसे मूल कार्यों के लिए नगर परिषद के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। वहीं दूसरी ओर, मिलीभगत का खेल ऐसा है कि जमीन बेचने के लिए आसानी से एनओसी (NOC) जारी कर दी जाती है और बिकने के बाद फौरन नामांतरण भी हो जाता है। इसके अलावा, ग्राम पंचायत के समय में किए गए मनमर्जी पट्टा वितरण ने भी परिवारों के बीच विवाद के गहरे बीज बो दिए हैं, जिनका समाधान आज तक नहीं हो सका है।

क्या अब होगा कायाकल्प? ‘दबंग’ सीएमओ से बंधी उम्मीदें

निराशा के इस माहौल में नई सीएमओ ज्योति सुनहरे के पदभार ग्रहण करते ही जनता की उम्मीदें जाग गई हैं। सीएमओ सुनहरे का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि वे जहां भी रहीं, अपने नवाचारों और सख्त फैसलों से हमेशा सुर्खियों में रहीं। जो अधिकारी कुछ नया करता है, उसके साथ प्रशंसा और विवाद दोनों का गहरा नाता होता है, और ज्योति सुनहरे इसका सटीक उदाहरण हैं।

उपलब्धियों, बुलडोजर और विवादों से भरा रहा है इतिहास

सीएमओ ज्योति सुनहरे का प्रशासनिक सफर बेहद कड़े फैसलों और चुनौतियों से भरा रहा है। वे टीकमगढ़, बड़ागांव धसान, सारंगपुर, सांची, रायसेन, दमोह (पथरिया) और बुधनी जैसी नगर परिषदों में पदस्थ रही हैं। सहारनपुर में पदस्थापना के दौरान उन्होंने अपने हाथों से बनाई गणेश प्रतिमा की विधि-विधान से स्थापना कर एक मिसाल पेश की थी। वहीं, सुरखी विधानसभा के राहतगढ़ में भीषण गर्मी में मतदान के दौरान मतदाताओं और कर्मचारियों के लिए शरबत की व्यवस्था कराई। राहतगढ़ में ही एक दिन छोड़कर मिलने वाले पानी की समस्या को दूर कर उन्होंने प्रतिदिन पेयजल सप्लाई सुनिश्चित कराई थी। सारंगपुर में होटलों की सफाई का औचक निरीक्षण किया। यहां तक कि ड्यूटी के दौरान सोने वाले सफाई कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर उन्हें हटा दिया, जिससे पूरे अमले में हड़कंप मच गया था। टीकमगढ़ में बतौर सीएमओ उन्होंने न्यायालयीन आदेशों का सख्ती से पालन कराया। पदभार संभालते ही उन्होंने अतिक्रमणकारियों पर बुलडोजर चलवा दिया (सरदार सिंह मार्केट की कार्रवाई काफी चर्चित रही)। दमोह (पथरिया) में उनकी कठोर, नियम-आधारित शैली अनैतिक कार्य करने वालों और भू-माफियाओं को रास नहीं आई। यहां उन्हें स्थानीय नेताओं के रिश्तेदारों से गंभीर धमकियां भी मिलीं, लेकिन वे पीछे नहीं हटीं। बुधनी (सीहोर) में उनके सख्त फैसलों और अतिक्रमण विरोधी अभियानों से बौखलाए असामाजिक तत्वों ने उनकी सरकारी गाड़ी तक को आग के हवाले कर दिया था। राजनीतिक दबाव और धमकियों के बीच काम करने के कारण उन पर कुछ अनुशासनात्मक प्रशासनिक कार्रवाइयां भी हुईं, लेकिन उनकी दबंग छवि बरकरार रही।

जिस अधिकारी के नाम से अतिक्रमणकारियों और कामचोरों में खौफ पैदा होता हो, उससे घोड़ाडोंगरी की जनता स्वाभाविक रूप से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठी है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अपनी जान पर खेलकर माफियाओं से लोहा लेने वाली सीएमओ ज्योति सुनहरे, घोड़ाडोंगरी में व्याप्त भ्रष्टाचार, ‘शुभ-लाभ’ के खेल और अतिक्रमण के मजबूत जाल को तोड़कर नगर को किस तरह विकास की मुख्यधारा से जोड़ पाती हैं।

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