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सारणी के मोरड़ोंगरी में हाहाकार, भीषण जल संकट से तड़प रहे ग्रामीण, ‘रबर स्टाम्प’ सरपंच को गांव की प्यास की खबर तक नहीं! – Madhya Pradesh Voice

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सारणी के मोरड़ोंगरी में हाहाकार, भीषण जल संकट से तड़प रहे ग्रामीण, ‘रबर स्टाम्प’ सरपंच को गांव की प्यास की खबर तक नहीं!


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14/04/2026 1:28 AM Total Views: 385504

प्रवीर कुमार, 7489579303

सारणी। भीषण गर्मी के इस मौसम में जहां एक ओर आसमान से आग बरस रही है, वहीं दूसरी ओर सारणी क्षेत्र के मोरड़ोंगरी गांव में पंचायत की घोर लापरवाही ने ग्रामीणों का कंठ सूखा दिया है। गांव में पेयजल संकट इतना भयावह हो चुका है कि पिछले डेढ़ महीने से ग्रामीण पानी की एक-एक बूंद के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं। इस भीषण जल संकट ने ग्राम पंचायत के विकास के खोखले दावों की पोल खोलकर रख दी है और पंचायत की कार्यप्रणाली को सीधे कठघरे में खड़ा कर दिया है।

डेढ़ महीने से सूखी हैं हलक, बोरवेल में गिरी मोटर

जानकारी के मुताबिक, गांव में जल आपूर्ति सुचारू करने के लिए बकायदा भूमिपूजन कर ट्यूबवेल लगाया गया था, लेकिन कुछ ही समय बाद उसकी मोटर जल गई। पंचायत की लापरवाही का आलम यह है कि जब सुधार के लिए मैकेनिक को बुलाया गया, तो मरम्मत के दौरान मोटर बोरवेल के अंदर ही गिर गई। इस भारी तकनीकी चूक और लापरवाही के बाद पंचायत ने समस्या को सुलझाने के बजाय उस पर पर्दा डालना और आंखें मूंदना ज्यादा बेहतर समझा। नतीजतन, पूरा गांव भीषण गर्मी में पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।

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सरपंच का चौंकाने वाला बयान: “मुझे तो पता ही नहीं…”

इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाला पहलू ग्राम पंचायत की महिला सरपंच यशोदा मर्सकोले का गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। जब इस गंभीर जल संकट को लेकर उनसे सवाल किया गया, तो उनका जवाब प्रशासनिक अमले की पोल खोलने वाला था।

सरपंच ने बेबाकी से कहा “मुझे इसकी जानकारी नहीं थी, आपके द्वारा पता चला है। मैंने अपने पति से पूछा तो उन्होंने बताया कि मोटर नीचे गिर गई है। लेकिन वह कब और कैसे सुधरेगी, मुझे नहीं मालूम।”

यह बयान स्पष्ट करता है कि गांव की चुनी हुई जन-प्रतिनिधि को गांव की सबसे बड़ी बुनियादी समस्या तक की भनक नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब सरपंच को ही कुछ नहीं पता, तो पंचायत की कमान असल में किसके हाथों में है?

‘सरपंच पति’ और सचिव के हाथों की कठपुतली बनी पंचायत

सरपंच की अनभिज्ञता ने गांव में ‘सरपंच पति’ प्रथा (प्रॉक्सी लीडरशिप) की हकीकत को उजागर कर दिया है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि चुनाव के समय सरपंच के पति बाकुड़ और पंचायत सचिव सुरेंद्र कुमार मर्सकोले ने गांव की तस्वीर बदलने और विकास की गंगा बहाने के बड़े-बड़े वादे किए थे। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चुनाव जीतने के बाद सरपंच केवल एक ‘रबर स्टाम्प’ बनकर रह गई हैं और पर्दे के पीछे से पंचायत का संचालन उनके पति और सचिव कर रहे हैं। इन दोनों की जुगलबंदी का खामियाजा आज मोरड़ोंगरी की प्यासी जनता भुगत रही है।

मील भर दूर से पानी लाने को मजबूर महिलाएं और बच्चे

पंचायत भवन से लेकर गांव के चौक-चौराहों तक अब केवल ठगे जाने की चर्चा है। तपती दुपहरी में गांव की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सिर पर बर्तन रखकर मीलों दूर से पानी ढोने को विवश हैं। जल संकट ने ग्रामीणों की दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और पंचायत प्रतिनिधि वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस त्रासदी की अनदेखी कर रहे हैं।

अब देखना यह है कि मीडिया में मामला उजागर होने के बाद क्या कुंभकर्णी नींद सो रहा प्रशासन जागता है, या फिर मोरड़ोंगरी के ग्रामीण इस भीषण गर्मी में यूं ही प्यासे तिल-तिल कर घुटने को मजबूर रहेंगे।

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