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छतरपुर खदान बनी अवैध कोयला तस्करी का केंद्र, सुरक्षा कर्मियों की मिलीभगत से ग्रामीण ईंट-भट्टों तक पहुंच रहा सरकारी कोयला – Madhya Pradesh Voice

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छतरपुर खदान बनी अवैध कोयला तस्करी का केंद्र, सुरक्षा कर्मियों की मिलीभगत से ग्रामीण ईंट-भट्टों तक पहुंच रहा सरकारी कोयला


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04/12/2025 12:34 AM Total Views: 363524

एक्सक्लूसिव: ‘खाकी’ की नाक के नीचे ‘काले सोने’ की लूट

बैतूल/सारणी। वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) की प्रतिष्ठित छतरपुर खदान इन दिनों कोयला माफियाओं के लिए ‘सोने की खान’ बन गई है। क्षेत्र में कोयले का अवैध कारोबार न केवल धड़ल्ले से चल रहा है, बल्कि अब यह एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है। सूत्रों के हवाले से जो जानकारी सामने आई है, वह WCL की सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की सतर्कता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

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सुरक्षा व्यवस्था की ‘नींद’ और माफिया की ‘जाग’

छतरपुर कोल माइंस की सुरक्षा का जिम्मा जिन कंधों पर है, वही अब सवालों के घेरे में हैं। जानकारी के मुताबिक, खदान से कोयले की चोरी और तस्करी का यह पूरा खेल सुरक्षा कर्मियों और तैनात गार्डों की कथित मिलीभगत (सांठ-गांठ) से चल रहा है। सुरक्षा तंत्र की निष्क्रियता का ही नतीजा है कि तस्कर बेखौफ होकर खदान क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और टनों कोयला पार कर देते हैं।

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सिंडिकेट का ‘मोडस ऑपरेंडी’: 200 की बोरी, लाखों का मुनाफा

इस अवैध कारोबार की परतें खोलने पर हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं कि तस्करी का यह नेटवर्क छतरपुर खदान से शुरू होकर ग्रामीण क्षेत्रों के ईंट-भट्टों और केसला, नागपुर तक फैला हुआ है। तस्करों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों से मात्र 200 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से कोयला खरीदा जाता है। इसके बाद ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में लोड कर इस कोयले को पहले खेतों में बने गुप्त ठिकानों पर डंप किया जाता है। यहाँ मुनाफे को दोगुना करने के लिए असली कोयले में ‘रिजेक्ट कोल’ (बेकार कोयला) मिलाया जाता है। गणित सीधा है—आधे टन कोयले को मिलावट कर एक टन बना दिया जाता है। ट्रांसपोर्ट: इसके बाद, यह मिलावटी कोयला ट्रैक्टरों के जरिए ईंट-भट्टों और ट्रकों में लोड कर बाहरी क्षेत्रों में सप्लाई किया जाता है।

मजबूरी का फायदा: कर्ज के जाल में फंसाकर बना रहे अपराधी

इस काले कारोबार का सबसे मानवीय और दुखद पहलू यह है कि कोल माफिया क्षेत्र के बेरोजगार और गरीब ग्रामीणों का शोषण कर रहे हैं। ग्रामीणों को पहले भारी ब्याज दर पर कर्ज दिया जाता है। जब वे कर्ज चुकाने में असमर्थ होते हैं, तो माफिया उन्हें दबाव में लेकर कोयला चोरी और ढुलाई के काम में लगा देते हैं। चंद रुपयों के लालच और कर्ज के बोझ तले दबे ये ग्रामीण, माफिया के लिए ढाल का काम करते हैं, जबकि असली मलाई सरगना खा रहे हैं।

जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल

इतने बड़े पैमाने पर चल रहे इस खेल की भनक क्या स्थानीय प्रशासन और WCL प्रबंधन को नहीं है? खदान से लेकर केसला तक ट्रैक्टर और ट्रक दौड़ रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा है। यह स्पष्ट करता है कि कोल माफियाओं की दबंगई के आगे सिस्टम या तो नतमस्तक है या फिर इसमें हिस्सेदार है।

बड़ा सवाल यह है कि क्या WCL प्रबंधन अपनी कुंभकर्णीय नींद से जागेगा और इस राष्ट्रीय संपत्ति की लूट पर लगाम लगाएगा?

इनका कहना है:—

  • मैं अभी छुट्टी पर हूं जल्दी ही वहां पहुंचकर आपकी दी हुई जानकारी पर जांच शुरू करता हूं जल्द ही आपराधिक गतिविधियों पर लगाम लगाई जाएगी। 

ऋतुराज, क्षेत्रीय सुरक्षा अधिकारी डब्ल्यू सी एल

  • डब्लूसीएल के छतरपुर खदान से कोयला चोरी होने के मामले में जानकारी नहीं है। और नाह डब्लूसीएल प्रबंधन द्वारा इस प्रकार की कोई शिकायत प्राप्त हुई है। आपके द्वारा जानकारी मिली है जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

मनोज उईके, चौकी प्रभारी पाथाखेड़ा

 

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