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RSS ने मनाई ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती: ‘जनजातीय गौरव’ और ‘स्वधर्म’ की रक्षा का संकल्प – Madhya Pradesh Voice

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RSS ने मनाई ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती: ‘जनजातीय गौरव’ और ‘स्वधर्म’ की रक्षा का संकल्प


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16/11/2025 8:12 PM Total Views: 386614

बैतूल/सारणी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भारत के गौरवशाली स्वाधीनता संग्राम के महान नायक, ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती सारनी के महर्षि वाल्मीकि शाखा ग्राउंड में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई। इस अवसर पर दो दर्जन से अधिक स्वयंसेवकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए, जनजातीय समाज के इस अद्वितीय महापुरुष को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।

श्रद्धा सुमन अर्पित कर किया गया नमन

कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान बिरसा मुंडा के छायाचित्र पर माल्यर्पण के साथ हुआ। तत्पश्चात, सभी स्वयंसेवकों ने ‘जय घोष’ करते हुए एक-एक कर पुष्प अर्पित किए और उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सतपुड़ा ताप विद्युत गृह सारनी में पदस्थ राजेश टेकाम ने की।

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दशरथ डांगे का ओजस्वी वक्तव्य: “जनजातीय नायकों का योगदान अविस्मरणीय” 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला सह संघचालक दशरथ डांगे ने अपने प्रभावशाली वक्तव्य में भगवान बिरसा मुंडा के जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “भारत के गौरवशाली स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों और योद्धाओं की एक लंबी और तेजस्वी परंपरा रही है, और भगवान बिरसा मुंडा का योगदान अविस्मरणीय है। उनका स्थान इस स्वतंत्रता संग्राम के श्रेष्ठतम नायकों और योद्धाओं में विशेष है।”

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डांगे जी ने आगे बताया कि 15 नवंबर 1875 को उलीहातु (झारखंड) में जन्मे भगवान बिरसा का यह 150वां जन्म वर्ष है। डांगे ने मिशनरी स्कूलों में जनजातीय छात्रों को उनकी धार्मिक परंपराओं से दूर कर मतांतरित करने के षड्यंत्रों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि केवल 15 वर्ष की आयु में ही बिरसा मुंडा ने इन षड्यंत्रों को समझते हुए धार्मिक अस्मिता और परम्पराओं की रक्षा के लिए संघर्ष प्रारंभ कर दिया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में भगवान बिरसा ने अपने समाज में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की लहर पैदा कर दी, जो उस समय विकट परिस्थितियों से जूझ रहा था। ब्रिटिश शासन द्वारा वनों के अधिग्रहण और जबरन श्रम नीतियों के विरोध में बिरसा मुंडा ने एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया। “अबुआ दिशुम-अबुआ राज” (हमारा देश-हमारा राज) था, जो हजारों युवाओं के लिए ‘स्वधर्म’ और ‘अस्मिता’ के लिए बलिदान देने का प्रेरणा मंत्र बन गया। धार्मिक आस्था, परंपराओं और स्वधर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए, वह पकड़े गए और मात्र 25 वर्ष की अल्पआयु में कारागार में संदिग्ध परिस्थितियों में उनका बलिदान हुआ। समाज के प्रति उनके अगाध प्रेम और बलिदान के कारण ही संपूर्ण जनजाति समाज उन्हें देव स्वरूप मानकर ‘धरती आबा’ कहकर श्रद्धान्वत होता है।

जनजातीय गौरव दिवस: एक राष्ट्रीय प्रेरणा

दशरथ डांगे ने बताया कि प्रतिवर्ष 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा का जन्मदिन केंद्र सरकार द्वारा “जनजातीय गौरव दिवस” के रूप में मनाया जाता है। उनका बलिदान स्वाधीनता संघर्ष में जनजातियों के महत्वपूर्ण योगदान का उदाहरण बनते हुए, संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक अमूल्य प्रेरणा स्रोत बन गया है।

उन्होंने संदेश दिया कि धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परम्परा, स्वाभिमान और जनजातीय समाज की अस्मिता की रक्षा हेतु भगवान बिरसा मुंडा के जीवन का संदेश आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

 

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