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‘बट सावित्री’ के रंग में रंगी वटवृक्षों की छाँव, सौभाग्यवती महिलाओं ने पति की लंबी उम्र के लिए की अटूट प्रार्थना! – Madhya Pradesh Voice

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‘बट सावित्री’ के रंग में रंगी वटवृक्षों की छाँव, सौभाग्यवती महिलाओं ने पति की लंबी उम्र के लिए की अटूट प्रार्थना!


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11/06/2025 8:52 PM Total Views: 429804

सिंदूर, रोली और मौली से सजे बरगद के पेड़, तपती धूप में भी नहीं डिगी भक्ति : पतिव्रता सावित्री की अमर कथा हुई जीवंत !


बैतूल/सारनी। बुधवार का दिन सारणी के लिए सामान्य नहीं, बल्कि आस्था और अटूट प्रेम का प्रतीक बनकर उभरा। शहर के विभिन्न इलाकों में स्थित प्राचीन वटवृक्षों (बरगद के पेड़ों) के नीचे सुबह से ही महिलाओं का हुजूम उमड़ पड़ा, जो भारतीय संस्कृति के एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व ‘बट सावित्री’ की पूजा-अर्चना करने पहुंची थीं। तपती धूप और व्यस्त दिनचर्या के बावजूद, महिलाओं का उत्साह और भक्ति देखते ही बन रही थी।

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वटवृक्षों के नीचे श्रद्धा का संगम:

कॉलोनियों और मोहल्लों के सार्वजनिक वटवृक्षों के पास सुबह से ही सुहागिन महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में, सोलह श्रृंगार किए हुए समूह बनाकर जुटना शुरू हो गईं। उनके हाथों में पूजा की थालियां थीं, जिनमें रोली, चावल, दीपक, फल, फूल, मिठाई और पवित्र धागा (मौली) सजा हुआ था। इन महिलाओं के चेहरों पर जहां एक ओर व्रत का तेज और भक्ति का भाव स्पष्ट दिख रहा था, वहीं दूसरी ओर अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की अटूट श्रद्धा भी झलक रही थी।

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पति की लंबी उम्र का आशीर्वाद: मौली और परिक्रमा का महत्व:

पूजा का मुख्य अनुष्ठान वटवृक्ष के चारों ओर परिक्रमा करते हुए उस पर मौली (पवित्र लाल धागा) बांधना था। एक-एक महिला ने बड़े ही भक्तिभाव से वटवृक्ष के तने पर मौली लपेटी और फिर वृक्ष के चारों ओर फेरे लगाए। यह परंपरा पतिव्रता सावित्री की उस कथा का स्मरण कराती है, जिन्होंने यमराज से अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। वटवृक्ष को त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का निवास स्थान माना जाता है और इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता है। इसलिए, इस वृक्ष की पूजा कर महिलाएं न केवल अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं, बल्कि अखंड सौभाग्य और घर में सुख-शांति का आशीर्वाद भी मांगती हैं।

सामुदायिक सौहार्द और पारंपरिक जीवंतता:

सारणी में यह नज़ारा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं था, बल्कि यह महिलाओं के बीच सामुदायिक सौहार्द और पारंपरिक मूल्यों की जीवंतता का भी प्रतीक बन गया। महिलाएं एक-दूसरे को बट सावित्री की शुभकामनाएं दे रही थीं, भजन-कीर्तन कर रही थीं और कथा-कहानी सुना रही थीं। यह पर्व उन्हें अपने पारिवारिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखता है, और उन्हें एक साथ आने का अवसर प्रदान करता है।

बट सावित्री का यह पवित्र पर्व नगर की महिलाओं के लिए न सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह उनके जीवनसाथी के प्रति उनके असीम प्रेम, समर्पण और विश्वास का भी परिचायक है। यह दिन इस बात को प्रमाणित करता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी भारतीय समाज अपनी परंपराओं और आध्यात्मिक मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

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