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बैतूल का तीताखेड़ा गांव: विकास की रोशनी से दूर, जान जोखिम में डालकर जीने को मजबूर हैं 45 परिवार – Madhya Pradesh Voice

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बैतूल का तीताखेड़ा गांव: विकास की रोशनी से दूर, जान जोखिम में डालकर जीने को मजबूर हैं 45 परिवार


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19/08/2026 9:54 PM Total Views: 455981

भोपाल। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले का एक छोटा सा गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अंधेरे और संघर्ष के साये में जीने को मजबूर है। घोड़ाडोंगरी तहसील के अंतर्गत आने वाली रामपुर पंचायत का तीताखेड़ा गांव, जहां करीब 45 परिवार निवास करते हैं, आज भी बिजली और पक्की सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का इंतजार कर रहा है।

हाल ही में इस गांव के ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए जो कदम उठाया, वह व्यवस्था पर एक गंभीर सवालिया निशान लगाता है।

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कलेक्टर के दरबार में पहुंचे ग्रामीण: 100 किमी का सफर और अनसुनी उम्मीदें

बुधवार को तीताखेड़ा गांव के ग्रामीण अपनी समस्याओं का पुलिंदा लेकर अपने गांव से करीब 100 किलोमीटर का सफर तय कर बैतूल जिला मुख्यालय पहुंचे। उन्होंने कलेक्टर को एक लिखित आवेदन सौंपकर गांव में जल्द से जल्द बिजली और पक्की सड़क बनवाने की पुरजोर मांग की है।

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ग्रामीणों का कहना है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी उनके गांव तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाई है। ग्राम पंचायत रामपुर की ओर से भी इस संबंध में कलेक्टर को आवेदन देकर मांग की गई है कि गांव का भौतिक निरीक्षण कराया जाए और जल्द से जल्द बिजली व सड़क की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

हर कदम पर मौत का पहरा: तीन उफनती नदियां और 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा

तीताखेड़ा गांव के लोगों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी किसी जंग से कम नहीं है। ग्रामीणों को वाहन योग्य कच्ची सड़क तक पहुंचने के लिए लगभग 5 किलोमीटर की लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। इस रास्ते में सोनभद्र नदी, गेड़ी नाला और खिड़का नदी पड़ती हैं, जिन पर कोई पक्का पुल या मार्ग नहीं है। ग्रामीण दशन और शेरसिंह ने आपबीती साझा करते हुए बताया कि जब वे बैतूल से कलेक्टर को ज्ञापन देकर लौट रहे थे, तब सोनभद्र नदी में पानी गले तक भरा हुआ था। उन्हें अपने कपड़े उतारकर और जान जोखिम में डालकर तैरकर या पैदल ही नदी पार करनी पड़ी।

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बारिश का मौसम: बनती है जीवन और मौत की चुनौती

बरसात के दिनों में तीताखेड़ा के ग्रामीणों की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। आवागमन के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, जिससे यह क्षेत्र शेष दुनिया से लगभग कट जाता है। आपात स्थिति में, विशेषकर गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। समय पर इलाज न मिलने से बड़ा खतरा हमेशा बना रहता है। रास्तों के खराब होने और बिजली न होने के कारण छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई पर विपरीत असर पड़ रहा है, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। बिजली के अभाव में पेयजल आपूर्ति से लेकर किसानों के कृषि कार्य तक बुरी तरह प्रभावित होते हैं।

अब प्रशासन के एक्शन का इंतजार

एक तरफ जहां देश के गांव डिजिटल युग की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं तीताखेड़ा के ये 45 परिवार आज भी सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य जैसी प्राथमिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले पर कितनी जल्दी संज्ञान लेता है और ग्रामीणों को इस नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है। ग्रामीण अब पूरी उम्मीद के साथ प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं।

क्या प्रशासन के जागने से पहले तीताखेड़ा के इन ग्रामीणों को किसी बड़े हादसे का इंतजार करना होगा?

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