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संसद में गूंजी बैतूल के ‘स्कूल’ की चीख: अब्दुल नईम के ध्वस्त अरमानों पर इमरान प्रतापगढ़ी का राज्यसभा में प्रहार – Madhya Pradesh Voice

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संसद में गूंजी बैतूल के ‘स्कूल’ की चीख: अब्दुल नईम के ध्वस्त अरमानों पर इमरान प्रतापगढ़ी का राज्यसभा में प्रहार


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07/02/2026 12:15 AM Total Views: 352732

बैतूल। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के एक छोटे से गांव ‘ढाबा’ में चला प्रशासन का बुलडोजर अब देश की संसद तक पहुंच गया है। एक मुस्लिम युवक द्वारा बनाए जा रहे स्कूल को जमींदोज किए जाने की घटना ने अब एक राष्ट्रीय विवाद का रूप ले लिया है। कांग्रेस सांसद और शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने राज्यसभा में इस मुद्दे को इतनी शिद्दत से उठाया कि सदन में सन्नाटा पसर गया और यह मामला अब ‘नए भारत’ की परिभाषा पर सवाल खड़े कर रहा है।

राज्यसभा में शेरो-शायरी के साथ तीखा हमला

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान, जब उपसभापति हरिवंश ने इमरान प्रतापगढ़ी को बोलने के लिए तीन मिनट का समय दिया, तो कांग्रेस सांसद ने अपने अंदाज में सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने अपनी बात की शुरुआत मशहूर शायर मुनव्वर राना के एक शेर से की:

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“बात दलीलों से तो रद्द होती है, उनके होंठों की खामोशी भी सनद होती है। कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़े सुखन, जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है।”

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प्रतापगढ़ी ने सदन में कहा कि देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां अमन और तालीम की बात करने वालों पर कार्रवाई हो रही है, जबकि नफरत के सौदागरों को संरक्षण दिया जा रहा है।

‘नया भारत’ या ‘नफरत का भारत’?

अपने ओजस्वी भाषण में प्रतापगढ़ी ने बैतूल की घटना को असम और कश्मीर के संदर्भ से जोड़ते हुए ‘नए भारत’ की विडंबना को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “मध्य प्रदेश के बैतूल में अब्दुल नईम नामक युवक ने अपनी मेहनत की कमाई से बच्चों के लिए स्कूल बनवाया। उसका सपना था कि गांव के बच्चे पढ़ें, लेकिन प्रशासन ने उस स्कूल पर बुलडोजर चलवा दिया। क्या उसकी गलती सिर्फ यह थी कि वह एक मुसलमान था और शिक्षा का प्रसार करना चाहता था?” उन्होंने असम के मुख्यमंत्री द्वारा मुसलमानों को राज्य छोड़ने पर मजबूर करने वाले बयानों और कश्मीर में नीट (NEET) परीक्षा पास करने वाले मुस्लिम बच्चों के मेडिकल कॉलेज की मान्यता रद्द किए जाने का भी जिक्र किया।

क्या था पूरा मामला? (घटनाक्रम)

यह विवाद बैतूल जिले की भैंसदेही तहसील के ढाबा गांव का है। जहां गांव के निवासी अब्दुल नईम ने अपनी डायवर्शन वाली (व्यावसायिक उपयोग हेतु परिवर्तित) जमीन पर करीब 20 लाख रुपये की लागत से एक स्कूल भवन तैयार किया था। उनका उद्देश्य ग्रामीण बच्चों को नर्सरी से आठवीं तक की सस्ती और अच्छी शिक्षा देना था।

नईम का दावा है कि उन्होंने पंचायत से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मांगा था और 30 दिसंबर को स्कूल शिक्षा विभाग व माध्यमिक शिक्षा मंडल में मान्यता के लिए आवेदन भी जमा कर दिया था। जनवरी माह में, पंचायत ने निर्माण को अवैध बताते हुए नोटिस जारी किया। इसके बाद एसडीएम अजीत मरावी के नेतृत्व में भारी पुलिस बल और प्रशासन ने स्कूल भवन को अतिक्रमण करार देते हुए जेसीबी से ढहा दिया। अपनी आंखों के सामने अपने सपनों को टूटता देख नईम कलेक्ट्रेट पहुंचे थे और चेतावनी दी थी कि यदि उनका स्कूल तोड़ा गया, तो वे परिवार सहित आत्मदाह कर लेंगे।

राजनीतिक गलियारों में उबाल

संसद में उठने से पहले ही यह मामला सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल चुका था। उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “नईम की गलती सिर्फ इतनी है कि वो एक भारतीय मुसलमान हैं। अगर वो किसी और समुदाय से होते तो शायद प्रशासन का रवैया कुछ और होता।” उन्होंने भी ट्वीट कर शिवराज सरकार (तत्कालीन संदर्भ/प्रशासनिक रवैये) पर सवाल उठाए और इसे शिक्षा के मंदिर पर हमला बताया।

प्रशासन का तर्क: “कानून सबके लिए बराबर”

विपक्ष के हमलों के बीच बैतूल जिला प्रशासन अपने रुख पर कायम है। बैतूल कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई किसी पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि नियमों के तहत की गई है। प्रशासन का कहना है कि निर्माण के लिए पंचायत अधिनियम की धारा 55 के तहत आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी। बिना वैध स्वीकृति के किया गया निर्माण अतिक्रमण की श्रेणी में आता है, जिसे हटाना प्रशासन की जिम्मेदारी थी।

बैतूल के ढाबा गांव का यह स्कूल अब केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि सियासत का अखाड़ा बन चुका है। एक तरफ प्रशासन की ‘तकनीकी वैधता’ की दलील है, तो दूसरी तरफ विपक्ष का आरोप है कि यह कार्रवाई ‘समुदाय विशेष’ को निशाना बनाने के लिए की गई है। अब देखना यह होगा कि संसद में उठे इस मुद्दे के बाद क्या सरकार इस मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश देती है या यह फाइल भी सियासी शोर में दब कर रह जाएगी।

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