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बैतूल का ‘छोटा व्यापम’? घोड़ाडोंगरी में स्वास्थ्य विभाग की भर्ती में ‘रेट कार्ड’ से बिकी नौकरियां, लाखों की बोली लगाकर बाहरी बने क्लर्क


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17/12/2025 9:32 PM Total Views: 386893

आरोग्यम उपस्वास्थ्य केंद्रों में धांधली की इंतहा, बिना परीक्षा और इंटरव्यू के चहेतों की ताजपोशी, आदिवासी युवाओं के हक पर डाका

बैतूल/घोड़ाडोंगरी। आदिवासी बाहुल्य घोड़ाडोंगरी ब्लॉक, जो अपनी भोली-भाली जनता और बुनियादी समस्याओं के लिए जाना जाता है, इन दिनों भ्रष्टाचार के एक नए एपिसेंटर के रूप में उभर रहा है। मामला ‘आरोग्यम उपस्वास्थ्य केंद्रों’ में डाटा एंट्री ऑपरेटर (क्लर्क) की भर्ती का है। सूत्रों की मानें तो यहां योग्यता और नियमों को रद्दी की टोकरी में डालकर, सरकारी कुर्सियों की खुलेआम नीलामी की गई है। इस भर्ती घोटाले ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता की पोल खोलकर रख दी है।

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भ्रष्टाचार का ‘रेट कार्ड’: जितनी देरी, उतनी भारी जेब

इस भर्ती प्रक्रिया में जिस तरह से ‘रेट कार्ड’ चलने की बात सामने आई है, वह किसी संगठित गिरोह की कार्यशैली जैसा प्रतीत होता है। सूत्रों के अनुसार, विकासखंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) कार्यालय के इर्द-गिर्द सक्रिय दलालों और प्रभावशाली लोगों ने समय के हिसाब से रिश्वत के रेट तय कर रखे थे जिसमें 1 से 15 नवंबर (शुरुआती दौर): 30,000 से 50,000 रुपये, 15 से 30 नवंबर (मध्य दौर): 50,000 से 1,00,000 रुपये, 1 दिसंबर के बाद (अंतिम दौर): 1,00,000 से 1,50,000 रुपये। जिसने नकद नारायण चढ़ा दिए, उसकी फाइल बिजली की गति से आगे बढ़ी। वहीं, गरीब और योग्य ग्रामीण युवाओं को यह कहकर लौटा दिया गया कि “पद भर चुके हैं,” जबकि वास्तविकता में उन पदों का सौदा हो चुका था।

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नियमों की धज्जियां: ‘लोकल फॉर वोकल’ सिर्फ जुमला?

सरकार का स्पष्ट नियम था कि उपस्वास्थ्य केंद्र में संबंधित ग्राम पंचायत के ही योग्य स्थानीय निवासी को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि ग्रामीण रोजगार बढ़े। लेकिन, घोड़ाडोंगरी में हुआ इसके ठीक उलट।

पैसे के लालच में नगरपालिका, नगर परिषद और शहरी क्षेत्रों के रसूखदार अभ्यर्थियों को नियुक्त कर दिया गया। ग्रामीण अंचल का युवा, जिसके लिए यह योजना बनी थी, वह आज भी ठगा सा महसूस कर रहा है। न कोई लिखित परीक्षा हुई, न साक्षात्कार और न ही मेरिट सूची का प्रकाशन—सीधे ‘बैकडोर एंट्री’ दी गई।

चिकित्सा विभाग: सेवा का मंदिर या भ्रष्टाचार का अड्डा?

यह मामला सिर्फ एक भर्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चिकित्सा विभाग में दीमक की तरह फैले भ्रष्टाचार का एक छोटा सा नमूना है। विभाग में लंबे समय से यह चर्चा है कि मलाईदार जगहों पर पोस्टिंग के लिए भी ‘चढ़ावा’ चढ़ता है। ग्रामीण अस्पतालों में अक्सर जरूरी दवाएं नदारद रहती हैं, लेकिन कागजों पर सब ‘ऑल इज़ वेल’ दिखाया जाता है। जब भी कोई घोटाला सामने आता है, तो जांच कमेटी के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। आरोग्यम भर्ती में BMO कार्यालय से जुड़े एक प्रभावशाली व्यक्ति की संदिग्ध भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई न होना उच्च अधिकारियों की मौन सहमति की ओर इशारा करता है।

सवाल जो जवाब मांगते हैं

इस कथित घोटाले ने जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों के सामने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या जिला कलेक्टर इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच के आदेश देंगे? क्या रिश्वत देकर नियुक्त हुए अपात्र अभ्यर्थियों को बाहर कर, स्थानीय ग्रामीण युवाओं को उनका संवैधानिक हक मिलेगा? क्या BMO कार्यालय में बैठे उन ‘सफेदपोश’ दलालों पर कार्रवाई होगी, जिन्होंने सरकारी नौकरी को दुकान का सामान बना दिया?

आरोग्यम योजना का उद्देश्य ग्रामीण स्वास्थ्य को सुदृढ़ करना था, लेकिन यदि इसकी नींव ही भ्रष्टाचार पर रखी जाएगी, तो परिणाम क्या होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यदि समय रहते इस ‘लूट’ पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह न केवल प्रशासन की विफलता होगी, बल्कि उन हजारों शिक्षित बेरोजगार आदिवासी युवाओं के सपनों की हत्या भी होगी।

इनका कहना है :—

  • 👉🏾 यह सभी आरोप झूठे हैं, यह जो भी पोस्टिंग हुई है जिला कार्यालय से हुई है। इस पोस्टिंग में ब्लॉक कार्यालय का कोई लेना देना नहीं है। बदकिस्मती उस वक्त मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था और मैं डेढ़ माह की छुट्टी पर था। उस वक्त डां. धाकड़ बीएमओ थे और उनका भी कोई लेना-देना नहीं है। मेरे ब्लॉक का इस पोस्टिंग से कोई लेना-देना नहीं है और ना ही मेरे ब्लॉक में कोई पोस्टिंग हुई है। वह एक गलत प्रयोजन था और वह सब गलती गलती में हुआ है।

डॉ संजीव शर्मा, बीएमओ घोड़ाडोंगरी

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