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धर्मजगत में शोक की लहर: नर नारायण सेवा आश्रम चोपना के संस्थापक गुरुदेव सुखानंद गोसाई (बाबुल गोसाई) ब्रह्मलीन – Madhya Pradesh Voice

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धर्मजगत में शोक की लहर: नर नारायण सेवा आश्रम चोपना के संस्थापक गुरुदेव सुखानंद गोसाई (बाबुल गोसाई) ब्रह्मलीन


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16/01/2026 8:16 PM Total Views: 462782

सारणी/चोपना। क्षेत्र के सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल नर नारायण सेवा आश्रम, चोपना के पूज्य संत और संस्थापक गुरुदेव सुखानंद गोसाई ब्रह्मचारी जी (जिन्हें भक्त प्रेम से ‘बाबुल गोसाई’ के नाम से जानते थे) ने 84 वर्ष की आयु में अपनी नश्वर देह का त्याग कर दिया है। उनके ब्रह्मलीन होने के समाचार से चोपना क्षेत्र सहित देश-विदेश में फैले उनके हजारों शिष्यों और अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई है।

 

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गुरुधाम में अंतिम श्वास और देवलोक गमन

प्राप्त जानकारी के अनुसार, गुरुदेव सुखानंद गोसाई जी कुछ दिनों पूर्व छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के पखांजोड़ स्थित अपने गुरु परम पूज्य सत्यानंद गोसाई जी के आश्रम गए थे। वहां वे एक विशेष कीर्तन कार्यक्रम में सम्मिलित होने पहुंचे थे। शुक्रवार की मध्यरात्रि लगभग 1:45 बजे, गुरुधाम के पवित्र वातावरण में ही उन्होंने अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया और प्रभु के चरणों में विलीन हो गए। यह एक संयोग ही है कि जिस गुरु की राह पर वे जीवन भर चले, उन्हीं के आश्रम में उन्होंने अंतिम विदा ली।

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चोपना में उमड़ा आस्था का सैलाब

शुक्रवार दोपहर जब गुरुदेव का पार्थिव शरीर छत्तीसगढ़ से चोपना स्थित नर नारायण सेवा आश्रम लाया गया, तो वहां का दृश्य अत्यंत भावुक कर देने वाला था। अपने आराध्य गुरु के अंतिम दर्शन के लिए सैकड़ों की तादाद में शिष्य और श्रद्धालु उमड़ पड़े।

भक्तों ने नम आंखों से गुरुदेव के पार्थिव शरीर को एक विशाल जुलूस के साथ आश्रम प्रांगण में लाया। इस दौरान पूरा वातावरण “हरे रामा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे” के महामंत्र के जाप से गूंज उठा। शोकाकुल होने के बावजूद, शिष्यों ने पूर्ण विधि-विधान और सेवा भाव के साथ गुरुदेव की अंतिम सेवा की।

पखांजोड़ से चोपना तक का तपस्वी जीवन

मूल रूप से पखांजोड़ (छत्तीसगढ़) के रहने वाले बाबुल गोसाई जी का परिवार आज भी वहीं निवासरत है, किंतु उन्होंने अपना जीवन समाज और धर्म के लिए समर्पित कर दिया था। सन् 1989 में उन्होंने अपने गुरु भाई नीलकांत गोसाई जी के साथ मिलकर चोपना में ‘नर नारायण सेवा आश्रम’ की स्थापना की थी।

आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उन्होंने इस आश्रम को तपोभूमि बनाया और सैकड़ों लोगों को दीक्षा देकर सन्मार्ग पर चलाया। उनके त्याग और तपस्या का ही परिणाम है कि आज उनके शिष्य न केवल प्रदेश में बल्कि देश के अन्य राज्यों और विदेशों में भी भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

शनिवार को होगी समाधि: अंतिम इच्छा का सम्मान

आश्रम के सूत्रों ने बताया कि गुरुदेव की अंतिम इच्छा थी कि वे चोपना के उसी नर नारायण सेवा आश्रम में समाधि लें, जिसे उन्होंने अपने हाथों से सींचा था। उनकी इस इच्छा का मान रखते हुए, शनिवार को उन्हें आश्रम स्थित मंदिर परिसर में समाधि दी जाएगी।

चूंकि उनके शिष्य देश-विदेश और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहते हैं, और सभी ने अंतिम दर्शन की इच्छा जाहिर की है, इसलिए उनके आगमन की प्रतीक्षा की जा रही है। शनिवार को सभी प्रमुख शिष्यों और संतों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ उन्हें भू-समाधि दी जाएगी।

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