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मजदूरों पर ‘कॉर्पोरेट वार’! नए लेबर कोड्स के खिलाफ मजदूर संगठनों का ‘आर-पार’ का ऐलान: ‘गुलामी का कानून’, छीन रहे संवैधानिक अधिकार! – Madhya Pradesh Voice

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मजदूरों पर ‘कॉर्पोरेट वार’! नए लेबर कोड्स के खिलाफ मजदूर संगठनों का ‘आर-पार’ का ऐलान: ‘गुलामी का कानून’, छीन रहे संवैधानिक अधिकार!


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23/11/2025 11:02 PM Total Views: 386595

भोपाल। केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा चार नए लेबर कोड्स (Labour Codes) की एकतरफा अधिसूचना और उनके आगामी कार्यान्वयन की सुगबुगाहट ने देश भर के मजदूर संगठनों में भारी आक्रोश भर दिया है। राजधानी भोपाल से लेकर देश भर के मजदूर संगठन इन कोड्स को मजदूर विरोधी और कॉर्पोरेट हितैषी बताते हुए सड़कों पर उतरने की तैयारी में हैं। सीटू राज्य समिति सदस्य (CITU) एवं स्पिनिंग मिल्स मजदूर एकता यूनियन मध्यप्रदेश के अतिरिक्त महासचिव कुलदीप सिंह राजपूत ने इन कोड्स को मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा “कॉर्पोरेट हमला” करार देते हुए सरकार को चेतावनी दी है कि ये नियम न केवल मजदूरों की कमर तोड़ेंगे, बल्कि उन्हें “गुलाम बनाने की साजिश” का हिस्सा हैं।

दशकों के संघर्ष पर पानी फेरने की तैयारी: 29 कानूनों को 4 में समेटा

कुलदीप सिंह राजपूत ने अपने तीखे बयान में कहा कि सरकार 29 पुराने और दशकों से स्थापित श्रम कानूनों को खत्म कर सिर्फ 4 नए लेबर कोड थोप रही है। उन्होंने याद दिलाया, “यह कानून रातों-रात नहीं बने थे, बल्कि मजदूरों के दशकों के खून-पसीने, संघर्ष और बलिदान से हासिल किए गए थे। इन कानूनों ने मजदूरों को शोषण से बचाने, सम्मानजनक मजदूरी और सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।”

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उन्होंने आगे आरोप लगाया, “सरकार का यह कदम रोजगार और निवेश बढ़ाने के नाम पर एक बड़ा छलावा है। असल में, यह मजदूरों की सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) की ताकत को कुचलने और हड़ताल जैसे संवैधानिक अधिकारों को छीनकर मालिक वर्ग को निरंकुश ताकत देने का एक सुनियोजित षड्यंत्र है।”

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सरकार का ‘सुधार’ बनाम मजदूरों की ‘बर्बादी’: एक कड़वी हकीकत

यूनियन ने सरकार के दावों और इन कोड्स की कड़वी हकीकत के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया कि कैसे ‘सुधार’ के नाम पर मजदूरों का शोषण वैध किया जा रहा है:

मजदूरी और वेतन: ‘टेक होम सैलरी’ पर डाका

सरकार का दावा: सभी श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलेगा।

यूनियन की हकीकत: नए नियमों से ‘टेक होम सैलरी’ (हाथ में आने वाला वेतन) नाटकीय रूप से घट जाएगी। पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी (Gratuity) में अधिक कटौती होने से मजदूर के हाथ में नकद पैसा कम आएगा, जिससे महंगाई के इस दौर में उसके लिए घर चलाना और भी मुश्किल हो जाएगा। यह भविष्य की बचत के नाम पर वर्तमान की रोटी पर सीधा हमला है।

रोजगार सुरक्षा: तलवार की तरह लटकती ‘हायर एंड फायर’ की नीति

सरकार का दावा: नए कोड से निवेश बढ़ेगा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

यूनियन की हकीकत: ये कोड्स “हायर एंड फायर” (Hire and Fire) की नीति को बेहद आसान बना देते हैं। मालिक जब चाहे, बिना किसी ठोस कारण के मजदूर को नौकरी से निकाल सकेगा, जिससे रोजगार की रही-सही सुरक्षा भी खत्म हो जाएगी। मजदूर अब पूरी तरह से मालिक की मनमानी पर निर्भर हो जाएंगे।

औद्योगिक संबंध: हड़ताल का अधिकार लगभग खत्म

सरकार का दावा: औद्योगिक शांति बनी रहेगी और विवाद कम होंगे।

यूनियन की हकीकत: हड़ताल करने के अधिकार को इतना जटिल और प्रतिबंधात्मक बना दिया गया है कि यह व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाएगा। यह ‘शांति’ नहीं, बल्कि मजदूरों की आवाज़ को हमेशा के लिए दबाने और उनके प्रतिरोध के अधिकार को छीनने का प्रयास है।

कार्य के घंटे: 8 से 12 घंटे की शोषणकारी व्यवस्था

सरकार का दावा: कार्य में लचीलापन (Flexibility) आएगा।

यूनियन की हकीकत: काम के घंटे 8 से बढ़कर 12 घंटे तक किए जाने का प्रावधान है। यह प्रावधान सीधे तौर पर शोषण को बढ़ावा देगा और ओवरटाइम (Overtime) के नियमों में भी हेरफेर की गुंजाइश पैदा करेगा, जिससे मजदूरों को बिना उचित भुगतान के अधिक काम करने पर मजबूर किया जाएगा।

लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन: त्रिपक्षीय वार्ता को नजरअंदाज

कुलदीप सिंह ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इन महत्वपूर्ण कानूनों को बनाने से पहले ट्रेड यूनियनों की आपत्तियों पर कोई गंभीर विचार नहीं किया और न ही वास्तविक त्रिपक्षीय सलाह (सरकार-मालिक-मेहनतकश आवा़म) ली गई। उन्होंने कहा कि संसद में भी बिना उचित बहस और विचार-विमर्श के इन कानूनों को जल्दबाजी में पास कराया गया, जो देश के लोकतांत्रिक मूल्यों का खुला उल्लंघन है।

सैलरी स्ट्रक्चर में बदलाव का कड़वा गणित: मजदूर की जेब पर सीधा असर

यूनियन ने नए वेज कोड के सबसे बड़े वित्तीय प्रभाव को भी स्पष्ट किया। इसके अनुसार, किसी भी कर्मचारी का बेसिक वेतन (Basic Salary) उसकी कुल सीटीसी (CTC – Cost to Company) का कम से कम 50% होना अनिवार्य होगा। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी (Gratuity) में कर्मचारी और नियोक्ता दोनों का योगदान बढ़ेगा।

नुकसान: हालांकि इससे भविष्य की बचत थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन वर्तमान में मजदूर के हाथ में आने वाला नकद वेतन (Cash in hand) काफी कम हो जाएगा। यह बदलाव विशेष रूप से निम्न और मध्यम-आय वर्ग के मजदूरों के लिए एक बड़ा झटका होगा, जो अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए मासिक वेतन पर निर्भर रहते हैं।

‘आर-पार’ की लड़ाई का ऐलान

स्पिनिंग मिल्स मजदूर एकता यूनियन ने साफ कर दिया है कि अगर इन “मजदूर विरोधी” कोड्स को रद्द नहीं किया गया, तो आने वाले समय में एक व्यापक और उग्र आंदोलन किया जाएगा। यूनियन ने इसे केवल श्रम कानून का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सम्मान से जीने के अधिकार की लड़ाई बताया है। कुलदीप सिंह राजपूत ने आह्वान किया है कि सभी मजदूर संगठन एकजुट होकर सरकार की इस “तानाशाही” नीति का विरोध करें और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करें। आने वाले दिन केंद्र सरकार और मजदूर संगठनों के बीच एक बड़े टकराव के गवाह बन सकते हैं।

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